भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 एवं समलैंगिक सम्बन्ध
महिपाल कहरा
शोधार्थी कलिंगा विष्वविद्यालय रायपुर
विधि विषय में पी-एचडी शोधार्थी
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
न पश्यति च जन्मान्धः कामानधो नैव पश्यति ।
न पश्यति मदोन्मतो हार्थि दोषात् न पश्यति।।
अर्थातः- जन्म से अंधा व्यक्ति देख नहीं सकता है, कामुकता में अंधा, धन में अंधा और अहम् में अंधे व्यक्ति को भी कभी अपने अवगुण नहीं दिखाई देते हैं। इसी कामुकता को रोकने के लिए भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 को अंग्रेजी शासन के दौरान साल 1861 में समलैंगिकता को अपराध घोषित किया गया था जिसके मुताबिक़ अगर कोई व्यक्ति जो भी कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छा पूर्वक संभोग करेगा अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है तो उसे उम्र कैद या जुर्माने के या दस साल तक की क़ैद हो सकती है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को आंशिक रूप से रद्द कर दिया था। दशकों तक इसे अपराध माना गया और इस वजह से समलैंगिक समाज अपनी भावनाओं का गला घोंटता रहा। इसे लेकर विरोध तो होता रहा लेकिन कानूनन इसे रास्ते से हटाने के लिए पहली कोशिश साल 2001 में की गई। नाज फाउंडेशन और।प्क्ै भेदभाव विरोध आंदोलन ने दिल्ली हाई कोर्ट में इस कलोनियन ऐक्ट को चुनौती दी। हालांकि, कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया और संबंधों की वैधता के अधिकार को हासिल करने की लड़ाई और लंबी हो गई। पहली सफलता हाथ तब आई जब साल 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ही जेंडर के दो बालिगों के बीच सहमति से बनाए गए संबंधों को वैध करार दिया। कोर्ट ने धारा 377 के प्रावधान को संविधान के आर्टिकल 14,15 और 21 का उल्लंघन माना। आर्टिकल 14 व्यक्ति को कानून के आगे समानता का अधिकार, आर्टिकल 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म के स्थान के आधार पर भेदभाव निषेध और आर्टिकल 21 निजी आजादी और जीवन की सुरक्षा का अधिकार देता है। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से कुछ साल के लिए आजादी का एहसास हुआ लेकिन साल 2013 में कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि कानूनी रूप से इसकी रक्षा नहीं की जा सकेगी। नाज फाउंडेशन ने कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की लेकिन कोर्ट ने उसे भी खारिज कर दिया। भारतीय दंड संहिता, 1860 की जगह प्रस्तावित की गई भारतीय न्याय संहिता, 2023 में आईपीसी की विवादित धारा 377 को पूरी तरह से हटा दिया गया है. यौन अपराधों से जुड़े मामलों में नाबालिग बच्चों को अभी भी लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत संरक्षित किया जाता है. 2012 में आए इस कानून से पहले, धारा 377 का इस्तेमाल नाबालिग लड़कों से यौन संबंध बनाने वाले व्यस्क पुरुषों के ख़िलाफ़ किया जाता है।
वहीं ट्रांस-व्यक्तियों के ख़िलाफ़ यौन शोषण के मामलों में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18 के तहत अधिकतम दो साल की सजा तय है. सैमसन कहते हैं, हालांकि,यह सज़ा बहुत कम है और पुलिस भी ट्रांसजेंडर अधिनियम को लागू करने में कोताही बरतती है
जैसे, नए बिल की धारा 138 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे का अपहरण करता है या उसे अप्राकृतिक वासना का शिकार बनाता है तो उसे 10 साल के लिए जेल भेजा जा सकता है. धारा 138 के तहत यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी की अप्राकृतिक वासना के ख़िलाफ़ अपने बचाव में सामने वाले की हत्या कर देता है तो ये हत्या अपराध नहीं माना जाएगा. लेकिन इन शब्दों को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है.न्यायालयों ने पहले भी अप्राकृतिक वासना शब्द का उपयोग पुरुषों के बीच यौन संबंध या वयस्क पुरुष और बच्चे के बीच यौन संबंध के मामलों में सुनवाई के दौरान किया है पर नए प्रस्तावित विधेयक के तहत यह केवल उन्हीं मामलों में लागू होगी जहां अपहरण का पहलू भी शामिल होगा।
KEYWORDS: भारतीय दण्ड संहिता, समलैंगिकता.
INTRODUCTION:
भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 प्रकृति विरूद्ध अपराध की बात करता है। पुरूष का पुरूष के साथ, स्त्री का स्त्री के साथ पुरूष या स्त्री या जीव-जन्तु के साथ इन्द्रिय भोग इस धारा के अधीन अपराध है। क्योंकि ऐसा प्रकृति की व्यवस्था के विरूद्ध है। समलैंगिक सम्बन्ध विश्व के कई देशों में विधि सम्मत बना दी गई थी पर भारत में धारा 377 के अधीन दण्डनीय माना गया था (फजल खाँ चौधरी बनाम राज्य 1983) दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 को असंवैधानिक ठहराया था। दिसम्बर, 2013 को दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को अमान्य घोषित किया। दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 28 जनवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध घोषित करने के फैसले पर पुनः विचार याचिका को खारिज किया। समलैंगिकता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय विकासशील एवं समावेशी समाज के साथ अन्याय प्रतीत होता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत आजादी के साथ-साथ संविधान के उदार-मूल्यों और आज के दौर ही आधुनिक भावना के साथ जुड़ा हुआ है। न्यायालय लिव इन रिलेशनशिप की प्रवृत्तियों को भी मान्यता दे चुके हैं।
· इन्द्रा शर्मा बनाम के.वी. शर्मा, (2013) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए कि लिव इन रिलेशनशिप में महिलाएं घरेलू हिंसा अधिनियम के संरक्षण की मांग कर सकती है। न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए कि कानून के उद्देश्य के लिए लिव इन रिलेनशिप क्या है।
· एस. खुशबू बनाम कन्नियामल, (2010), के मामले में न्यायालय ने कहा कि, बिना शादी के एक साथ रहने वाले पुरूष और महिला को, अपराध के रूप व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है।
· चन्मुनिया बनाम चुन्मुनिया कुमार सिंह, (2011), के मामले में उच्चतम न्यायालय ने माना कि लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं हर उस दावें और राहत की हकदार है जो एक कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के लिए सुलभ है।
· नाज फाउन्डेशन बनाम सरकार 2010 धारा 377 की संवैधानिकता के सम्बन्ध में विचार करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यह धारा व्यक्ति की गरिमा को वंचित करती है, उसके सारभाग पहचान को अकेले लैंगिकता के आधार पर अपराधिकृत करती है। इस प्रकार यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है।
यह धारा समलैंगिक व्यक्तियों के सम्पूर्ण व्यक्तित्व, अधिकारों को वंचित करती है। जो अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण की धारणा में अन्तर्निहित हैं। समलैंगिक रोग या विकार नहीं है। यह मानव लैंगिकता की मात्र एक अन्य अभिव्यक्ति है, लोक नैतिकता के आधार पर वयस्कों के मध्य सम्मति से बनाये गये लैंगिक कार्यों पर नियंत्रण करने के लिए धारा 377 को बनाये रखा नहीं जा सकता है। पुरूष को पुरूष के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाते हैं, समलैंगिक समुदाय के विरूद्ध धारा 377 के अधीन विभेदीकरण होता है, यह अनुचित अयुक्तियुक्त है। इस धारा से भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15, 21 का उल्लंघन होता है। केन्द्र सरकार, गैर-सरकारी संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय में पुनः विचार की अपील की थी। जिसके परिणामस्वरूप जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिक सम्बन्धों को वैध घोषित करने वाली याचिका पर पुनः विचार करने के लिये तैयार हुआ। 6 सितम्बर 2018 सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस नरीमन, खानाविलकर, चंद्रचुड़, इंदू मल्होत्रा की संविधान पीठ ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 के प्रावधानों को रद्द करते हुए कहा कि दो बालिगों के बीच निजी तौर पर बनाए गए समलैंगिक सम्बन्ध अपराध नहीं हैं। संविधान पीठ ने 158 साल पुरानी दण्ड संहिता 1860 (1861 को लागू) की धारा 377 को अतार्किक मनमाना करार देते हुए निजी पसंद को सम्मान देने की बात कही अदालत ने कहा भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 गरिमा के साथ जीने के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने नैतिकता, सामाजिकता के खिलाफ जाकर समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला। सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिक सम्बन्धों के पक्ष में दिया गया निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 का संरक्षण करता है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश भगवती जी ने यह निर्णय दिया था कि समता एक गतिशील धारणा है जिसके अनेक रूप, आयाम हो सकते हैं। इसे परम्परागत सिद्धान्तवाद की सीमाओं से नहीं बाँधा जा सकता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 राज्य की कार्यवाहियों में मनमानेपन को वर्जित करती है समान व्यवहार की अपेक्षा करती है (ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य 1974), (मेनका गाँधी बनाम भारत संघ 1978), (डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ 1983) भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक मानव को गरिमा, निजता, एकान्तता, दैहिक स्वतन्त्रता के साथ जीने का अधिकार देता है, ऐसा निर्णय उच्चतम न्यायालय ने लिया था इसी को आधार मानकार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14, 15, 21 को उल्लंघन न हो भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 377 में समलैंगिकता को अपराध नहीं माना (मेनका गाँधी बनाम भारत संघ 1978), (फ्रेन्सीस कोरेली बनाम भारत संघ 1981)
धारा 377 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्राचीन भारत में होमसेक्शूऐलिटी ना ही अपराध था और ना ही दंडनीय था, ऐसे कई उदाहरण है जो इस बात की पुष्टि करते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित है-
खजुराहो मंदिर- यह ख्यात मंदिर मध्यप्रदेश में स्थित है और ऐसी कई मूर्तियों से सजाया गया है जो कामुकता (सेक्शूऐलटी) को दर्शाती है। दसवीं शताब्दी में यह मंदिर राजपूत चंदेल राजवंश (राजपूत चंदेला डायनेस्टी) के राजाओं ने बनवाया था। मानव प्रकृति के सभी भावों को दर्शाने वाला ऐसा कोई अन्य मंदिर भारत में नहीं मिलेगा। इनमें से कई मूर्तियां होमसेक्शूऐलिटी दर्शाती है और इस बात का परिमाण देती है कि प्राचीन भारत में होमसेक्शूऐलिटी मौजूद थी।
मनुस्मृति- यह एक प्रसिद्ध कानून संहिता है, जिसका पालन प्राचीन भारत के ज्यादातर लोग करते थे। यह संहिता पुरुष या महिला द्वारा किए समलैंगिक कार्य के लिए दंड निर्धारित करता है। हालांकि, यह आलेख (स्क्रिप्ट), समलैंगिक कार्यों की पुष्टि (अप्रूव) नहीं करता और इस बात का परिमाण देता है कि प्राचीन भारत में होमसेक्शूऐलिटी मौजूद नहीं था।
अर्थशास्त्र- यह एक प्राचीन नियमावली (मैनुअल) है, जिसे “कौटिल्य अर्थशास्त्र”कहा जाता है। यह प्राचीन भारत में होमसेक्शूऐलिटी के मौजूद न होने का अन्य परिमाण देता है क्योंकि यह नियमावली इस बात की पुष्टि करता है कि राजा पर यह जिम्मेदारी थी कि वह होमसेक्शूऐलिटी के लिए लोगों को दंड दे।
होमसेक्शूऐलिटी को अपराध किसने बनाया (हु क्रिमिनलाइजड होमसेक्शूऐलिटी) ? यह वह प्रश्न है जिसका उत्तर जानने के लिए समलैंगिक स्त्री, समलैंगिक पुरुष, बाइसेक्शूअल और ट्रांसजेंडर समाज के सभी लोग उत्सुक हैं। भारतीय दंड संहिता,1860, ब्रिटिश औपनिवेशिक (कॉलोनियल) शासक द्वारा 19वी शताब्दी में बनाया गया था। यह संहिता पूर्ण रूप से, उस वक्त के अंग्रेजी कानूनों पर आधारित था और तमाम जटिल (कॉम्प्लिकेटेड) स्थितियों से भरा हुआ था और धारा 377 उनमें से एक है। धारा 377, 16वीं शताब्दी के द बुग्गेरी एक्ट,1533 के अनुसार बनाया गया था।
द बुग्गेरी एक्ट,1533ः
यह अधिनियम समलैंगिक कार्य, सोडोमी, जानवरों से जुड़ी यौन गतिविधियाँ (सेक्शूअल एक्टिविटीज) को अप्राकृतिक (अननेचुरल) अपराध परिभाषित करता है। इंग्लैंड के सांसद (पार्लियामेंट) ने इस अधिनियम को 1533 में, किंग हेनरी के शासन में पारित किया। इस अधिनियम के अंतर्गत अप्राकृतिक अपराध, मृत्यु दंड द्वारा दंडित किया जाता था। थॉमस मैकविले के द्वारा, भारत की सबसे पहली विधि आयोग (लॉ कमीशन) यह कानून लाया गया और इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के प्रारूप (ड्राफ्ट) में शामिल किया ।
धारा 377 की चुनौतियां (चौलेंजेज टू सेक्शन 377)ः
नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाईजेशन -एड्स भेदभाव विरोधी अभियान (ए.बी.वी.ए.) धारा 377 ने सबसे पहली चुनौती का सामना 1994 में किया। इस गैर सरकारी संगठन ने दिल्ली हाई कोर्ट में, इस धारा को अपराध से मुक्त करने की याचिका दायर करी। मामले के तथ्य कुछ इस तरह थे, तिहार जेल में होमसेक्शूऐलिटी का ऑब्जर्वेशन करने के बाद संगठन के कर्मचारी, पुरुष कैदियों को निरोध (कंडोम) बांटना चाहते थे परंतु उस वक्त की तिहार जेल की सुपरिंटेंडेंट, किरण बेदी ने इसकी पुष्टि (अप्रूवल) यह कहते हुए नहीं करी, की यह होमसेक्शूऐलिटी को बढ़ावा देगा। 2001 में यह याचिका खारिज कर दी गई।
· नाज फाउंडेशन बनाम गवर्नमेंट ऑफ एन.सी.टी. ऑफ दिल्ली अन्य (2009) उठाए गए मुद्दे
· क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377, संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन (वॉयलेट) करती है?
· क्या धारा 377, संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है?
· क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377 असंवैधानिक (अनकंस्टीट्यूशनल) है?
कोर्ट ने धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 21, 14 और 15 का उल्लंघन करता है। हालांकि की धारा 377 अभी भी असहमति से किए गए शिश्न गैर योनि (पिनाइल नॉन वेजाइनल) जिसमें नाबालिक (18 साल से नीचे) व्यक्ति शामिल हो, ऐसे मामलों मे लागू होगी।
सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउन्डेशन, (2014)
सुरेश कुमार कौशल और अन्य बनाम नाज फाउंडेशन और अन्य के मामले की याचिका यह केस धारा 377 के पूर्व फैसल, नाज फाउंडेशन बनाम गवर्नमेंट ऑफ एन.सी.टी ऑफ दिल्ली अन्य के खिलाफ याचिका है।
उठाए गए मुद्दे (इश्यूज रेजड)
· क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है?
· क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है?
· क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 377 असंवैधानिक है?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्को को सुनकर यह फैसला सुनाया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 असंवैधानिक नहीं है और संविधान द्वारा दिए गए किसी भी अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है।
नवतेज सिंह जौहर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017)ः
न्यायालय ने कौशल निर्णय की वैधता पर विचार-विमर्श किया। न्यायालय ने यह भी विचार किया कि क्या धारा 377 निम्नलिखित का उल्लंघन करती है?
· क्या अनुच्छेद 14 व्यक्तियों के साथ उनके यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान के आधार पर भेदभाव करता है?
· समान लिंग वाले व्यक्तियों के बीच निजी सहमति से किए गए कृत्यों को दंडित करके अनुच्छेद 21 के तहत स्वायत्तता और सम्मान का अधिकार?
· एलजीबीटीक्यूआई$ समुदाय की लैंगिक अभिव्यक्ति को अपराध घोषित करके अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन?
इस वाद में उच्चतम न्यायालय अधीन समलैंगिक इन्द्रिय भोग को कतिपय शर्तों के साथ संवैधानिक मान्यता प्रदान की है, अर्थात् अब इसे दण्डनीय अपराध नहीं माना जाएगा। इस प्रकार का समलैंगिक सम्भोग या इन्द्रिय-भोग केवल उसी दशा में वैध (ग्राह्य) होगा यदि वह-
1. दो वयस्कों के मध्य हो।
2. स्वैच्छिक (टवसनदजंतल) हो, तथा
3. प्राइवेट स्थान पर किया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि धारा 377, संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है और इसलिए असंवैधानिक है। कोर्ट ने, सुप्रीम कोर्ट के सुरेश कुमार कौशल और अन्य बनाम नाज फाउंडेशन और अन्य, के निर्णय को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी घोषित किया कि धारा 377 केवल असहमति से किए गए लैंगिक अपराधों को दंडित करेगा जो किसी युवा या नाबालिक के खिलाफ किए गए हो।
निष्कर्षः
समलैंगिकता भारत में धारा 377 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध न हो भले हि इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया गया हो परन्तु वर्तमान कानून व्यवस्था इन्हे विवाह कि अनुमति नही देता, चाहे विश्व के अन्य देशों में इसे विधिक मान्यता प्राप्त हो।
विषेष विवाह अधिनियम 1954ं भारत में समान-लिंग वाले जोड़ों के लिए पंजीकृत विवाह या नागरिक संघों को मान्यता नहीं देता है, इस सतरंगी रूपी प्रेम को बदरंग बनाने का काम किया है।
धारा 377 के आसपास मुकदमा 2001 में शुरू हुआ एनजीओ नाज फाउंडेशन ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें भारतीय दंड संहिता के एक प्रावधान को चुनौती दी गई, जिसने “प्रकृति के आदेश के खिलाफ संभोग”को दंडनीय अपराध बना दिया. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में श्क्वबजतपदम व िच्तवहतमेेपअम त्मंसपेंजपवद व ित्पहीजेश् सिद्धांत को अपनाया था। इस सिद्धान्त के अंतर्गत यदि कोई अधिकार एक बार व्यक्तियों को दे दिया जाता है तो राज्य पुनः उसे वापस नहीं ले सकता।
संदर्भ सूची:-
· पुस्तकें
1. सूर्य नारायाण मिश्र भारतीय दण्ड संहिता 28 वां संस्करण 2021
2. डॉ. एन. वी. परांजपे भारतीय दण्ड संहिता 10 वां संस्करण 2022
3. डॉ. बसन्ती लाल बाबेल 25 वां संस्करण 2023
4. सुनील खिलनानी, द आइडिया ऑफ इंडिया 180 (2004)।
Ø मामलों
Ø नाज़ फाउंडेशन बनाम दिल्ली सरकारए ;2009द्ध 160 डीएलटी 277
Ø सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशनए ;2014द्ध 1 एससीसी 1ण्
Ø नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघए एआईआर 2018 एससी 4321
Ø गृह मामलों के मंत्री बनाम फौरीए ;2006द्ध 1 एसए 524 ;सीसीद्ध
Ø केएस पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडियाए दीपिका सिंह बनाम केंद्रीय प्रशासनिक
Ø सुप्रियो बनाम भारत संद्य रिट 2023
· ऑनलाइन स्रोत
· सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से किया इनकारए
· https://hindi.livelaw.in/category/news-updates/supreme-court-refuses-to-
· recognize-same-sex-marriages-says-that-union-shall-form-committee-to-
· determine-rights-of-queer-unions-240342
· भारत में समलैंगिक विवाह https://www.drishtiias.com/hindi/daily-updates/daily-news-analysis/same-sex-marriage-in-india
· समलैंगिक विवाह पर सुनवाईरू सुप्रीम कोर्ट का निर्णय https://www.nextias.com/blog
· https://blog.ipleaders.in/sex-marriages-india-personal-laws/
|
Received on 04.06.2024 Revised on 23.09.2024 Accepted on 05.12.2024 Published on 25.03.2025 Available online from March 31, 2025 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(1):27-32. DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00005 ©A and V Publications All right reserved
|
|
|
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License. Creative Commons License. |
|